Life Changing thoughts

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भय और प्रेम

भय और प्रेम साथ-साथ हो कैसे सकते हैं? Osho is ke liye btate h इतना भय कि पति कहीं किसी स्त्री की आँख में न आँख डाल कर देख लें! तो फिर प्रेम घटा ही नहीं है। फिर तुम्हारी आँख में आँख डालकर पति ने नहीं देखा और न तुमने पति की आँख में आँख डालकर देखा है। न तुम्हें पति में परमात्मा दिखाई पड़ा है, न पति को तुममें परमात्मा दिखाई पड़ा है। तो यह जो संबंध है, इसको प्रेम का संबंध कहोगे?

Agr प्रेम घटे तो भय विसर्जित ho जाता है। तब पति सारी Duniya की स्‍त्रियों की आँख में आँख डाल कर देखता रहे तो भी कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। Har स्त्री की आँख में तुम्हीं को पा लेगा। हर स्त्री की आँख में तुम्हारी ही आँख मिल जाएगी क्योंकि हर स्त्री तुम्हारी ही ‍प्रतिबिंब हो जाएगी। हर स्त्री को देख कर तुम्हारी ही याद आ जाएगी। लेकिन prem घटता नहीं; किसी तरह संभाले है अपने को।

ऐसे ही तुम्हारे सब प्रेम के संबंध हैं। एक-दूसरे पर पहरा है। एक-दूसरे के साथ दुश्मनी है, प्रेम कहाँ! प्रेम में पहरा कहाँ? प्रेम में भरोसा होता है। प्रेम में एक आस्था होती है। प्रेम में एक अपूर्व श्रद्धा होती है। ये सब प्रेम के ही फूल हैं – https://wealthhiwealth.com/ओशो-रोने-का-अर्थ-क्या-है/ श्रद्धा, भरोसा, विश्वास। प्रेमी अगर विश्वास न कर सके, श्रद्धा न कर सके, भरोसा न कर सके, तो प्रेम में फूल खिले ही नहीं। ईर्ष्या, जलन, वैमनस्य, द्वेष, मत्सर तो घृणा के फूल हैं। तो फूल तो तुम घृणा के लिए हो और सोचते हो प्रेम का पौधा लगाया है। नीम के कड़वे फल लगते हैं तुममें और सोचते हो आम का पौधा लगाया है। इस भ्रांति को तोड़ो।

इसलिए जब मैं तुमसे कहता हूँ कि प्रेम सत्य तक जाने का मार्ग बन सकता है तो तुम मेरी बात को सुन तो लेते हो लेकिन भरोसा नहीं आता। क्योंकि तुम प्रेम को भलीभांति जानते हौ। उसी प्रेम के कारण तुम्हारा जीवन नरक में पड़ा है। अगर मैं इसी प्रेम की बात कर रहा हूँ तो निश्चित ही मैं गलत बात कर रहा हूँ। मैं किसी और प्रेम की बात कर रहा हूँ – उस प्रेम की, जिसकी तुम तलाश कर रहे हो, लेकिन जो तम्हें अभी तक मिला नहीं है। मिल सकता है, तुम्हारी संभावना है। और जब तक न मिलेगा तब तक तुम रोओगे, तड़पोगे, परेशान होओगे। जब तक तुम्हारे जीवन का फूल न खिले और जीवन के फूल में प्रेम की सुगंध न उठे, तब तक तुम बेचैन रहोगे। अतृप्त! तब तक तुम कुछ भी करो, तुम्हें राहत न आएगी, चैन न आएगा। खिले बिना आप्तकाम न हो सकोगे। प्रेम तो फूल है।

ओशो

ओशो, जीवन रहस्य

एक संन्यासी ईश्वर की खोज में निकला हुआ था और एक आश्रम में जाकर ठहरा। पंद्रह दिन तक उस आश्रम में रहा, फिर ऊब गया। उस आश्रम का जो बूढ़ा गुरु था वह कुछ थोड़ी सी बातें जानता था, रोज उन्हीं को दोहरा देता था। फिर उस युवा संन्यासी ने सोचा, यह गुरु मेरे योग्य नहीं, मैं कहीं और जाऊं। यहां तो थोड़ी सी बातें हैं, उन्हीं का दोहराना है। कल सुबह छोड़ दूंगा इस आश्रम को, यह जगह मेरे लायक नहीं।

लेकिन उसी रात एक घटना घट गई कि फिर उस युवा संन्यासी ने जीवन भर वह आश्रम नहीं छोड़ा। क्या हो गया? रात एक और संन्यासी मेहमान हुआ। रात आश्रम के सारे मित्र इकट्ठे हुए, सारे संन्यासी इकट्ठे हुए, उस नये संन्यासी से बातचीत सुनने। उस नये संन्यासी ने बड़ी ज्ञान की बातें कहीं, उपनिषद की बातें कहीं, वेदों की बातें कहीं। वह इतना जानता था, इतना सूक्ष्म उसका विश्लेषण था, ऐसा गहरा उसका ज्ञान था कि दो घंटे तक वह बोलता रहा। सबने मंत्रमुग्ध होकर सुना। फिर उस युवा संन्यासी के मन में हुआ : गुरु हो तो ऐसा हो। इससे कुछ सीखने को मिल सकता है। एक वह गुरु है, वह चुपचाप बैठा है, उसे कुछ भी पता नहीं। अभी सुन कर उस बूढ़े के मन में बड़ा दुख होता होगा, पश्चात्ताप होता होगा, ग्लानि होती होगी–कि मैंने कुछ न जाना और यह अजनबी संन्यासी बहुत कुछ जानता है।

युवा संन्यासी ने यह सोचा कि आज वह बूढ़ा गुरु अपने दिल में बहुत-बहुत दुखी, हीन अनुभव करता होगा। तभी उस आए हुए संन्यासी ने बात बंद की और बूढ़े गुरु से पूछा कि आपको मेरी बातें कैसी लगीं?

बूढ़ा गुरु खिलखिला कर हंसने लगा और कहने लगा, तुम्हारी बातें? मैं दो घंटे से सुनने की कोशिश कर रहा हूं तुम तो कुछ बोलते ही नहीं हो। तुम तो बिलकुल बोलते ही नहीं हो।

वह संन्यासी बोला, दो घंटे से मैं बोल रहा हूं आप पागल तो नहीं हैं! और मुझसे कहते हैं कि मैं बोलता नहीं हूं।

उस ने कहा, हां, तुम्हारे भीतर से गीता बोलती है, उपनिषद बोलता है, वेद बोलता है, लेकिन तुम तो जरा भी नहीं बोलते हो। तुमने इतनी देर में एक शब्द भी नहीं बोला! एक शब्द तुम नहीं बोले, सब सीखा हुआ बोले, सब याद किया हुआ बोले, जाना हुआ एक शब्द तुमने नहीं बोला। इसलिए मैं कहता हूं कि तुम कुछ भी नहीं बोलते हो, तुम्हारे भीतर से किताबें बोलती हैं।

एक ज्ञान है जो उधार है, जो हम सीख लेते हैं। ऐसे ज्ञान से जीवन के सत्य को कभी नहीं जाना जा सकता। जीवन के सत्य को केवल वे जानते हैं जो उधार ज्ञान से मुक्त होते हैं। और हम सब उधार ज्ञान से भरे हुए हैं। हमें ईश्वर के संबंध में पता है। और ईश्वर के संबंध में हमें क्या पता होगा जब अपने संबंध में ही पता नहीं है? हमें मोक्ष के संबंध में पता है। हमें जीवन के सभी सत्यों के संबंध में पता है। और इस छोटे से सत्य के संबंध में पता नहीं है जो हम हैं! अपने ही संबंध में जिन्हें पता नहीं है, उनके ज्ञान का क्या मूल्य हो सकता है?

लेकिन हम ऐसा ही ज्ञान इकट्ठा किए हुए हैं। और इसी ज्ञान को जान समझ कर जी लेते हैं और नष्ट हो जाते हैं। आदमी अज्ञान में पैदा होता है और मिथ्या ज्ञान में मर जाता है, ज्ञान उपलब्ध ही नहीं हो पाता।

दुनिया में दो तरह के लोग हैं एक अज्ञानी और एक ऐसे अज्ञानी जिन्हें ज्ञानी होने का भ्रम है। तीसरी तरह का आदमी मुश्किल से कभी-कभी जन्मता है। लेकिन जब तक कोई तीसरी तरह का आदमी न बन जाए, तब तक उसकी जिंदगी में न सुख हो सकता है, न शांति हो सकती है। क्योंकि जहां सत्य नहीं है, वहां सुख असंभव है। सुख सत्य की छाया है। जिस जीवन में सत्य नहीं है, वहां संगीत असंभव है, क्योंकि सभी संगीत सत्य की वीणा से पैदा होता है। जिस जीवन में सत्य नहीं है, उस जीवन में सौंदर्य असंभव है; क्योंकि सौंदर्य वस्त्रों का नाम नहीं है और न शरीर का नाम है। सौंदर्य सत्य की उपलब्धि से पैदा हुई गरिमा है। और जिस जीवन में सत्य नहीं है, वह जीवन अशक्ति का जीवन होगा, क्योंकि सत्य के अतिरिक्त और कोई शक्ति दुनिया में नहीं है।

ओशो, जीवन रहस्य

राम राम जिन्दगी भर कहने से क्या फायदा है

 प्रिय मित्र कई लोग जिन्दगी भर राम राम  करते है

Osho राम राम जिन्दगी भर कहने से क्या फायदा

आप का सवाल कि osho राम राम जिन्दगी भर कहने से क्या फायदा इस पर

एक कथा कहता हू

बंगाल में एक बहुत बड़ा वैयाकरण हुआ। कभी मंदिर नहीं गया। उसके पिता बूढ़े होने लगे थे, नब्बे साल की उम्र हो गयी पिता की। बेटा भी अब कोई सत्तर पार कर रहा है। आखिर पिता ने कहा कि तू कब जाएगा मंदिर, कब राम को पुकारेगा? तो बेटे ने कहा : मैं हूं व्याकरण का ज्ञाता हूँ   aur sab logo ki trh राम राम जिन्दगी भर कहने से क्या फायदा  लगूं आखिर  एक वचन में “राम”, “राम” जिंदगी भर कहने से क्या फायदा? बहुवचन में एक ही बार राम को पुकार लेंगे। और एक ही बार पुकारूंगा! और पुकार सच्ची होगी तो एक ही बार में पहुंच जाएगी। और पुकार अगर झूठी है तो करोड़ बार में भी कैसे पहुंच सकती है? नाव अगर कागज की है तो करोड़ बार चलाओ, डूब—डूब जाएगी। नाव सच्ची हो तो बस एक बार छोड़ी कि उस पार पहुंची। ऐसे अंधेरे में तीर चलाने से क्या फायदा है? एक बार समग्र शक्ति लगाकर सारी आंखों को एकजुट करके, एकाग्र करके पुकार लूंगा राम को। पिता ने कहा : मैं बूढ़ा हो गया हूं, तू भी सत्तर साल का हुआ, अब इन व्यर्थ की बातों में मत लगा रह। जब भी तुझसे कहता हूं, तभी तू यह बात कहता है—एक बार पुकार लूंगा! आखिर कब पुकारेगा? तो उसने कहा : आज ही पुकार लेता हूं।

बेटा मंदिर की तरफ चल पड़| जैसे बाप भी रोज मंदिर जाता था. . .जिंदगीभर का नियम था। बाप राह देखता रहा कि बेटा लौटता होगा, लौटता होगा, लौटता होगा। नहीं लौटा। दोपहर होने लगी, सूरज ढलने लगा


तो बाप भागा मंदिर गया कि बात क्या हुई? तब तक मंदिर से भी लोग आ रहे थे, उन्होंने कहा कि तुम्हारा बेटा तो चल बसा। उसने तो बस एक बार मूर्ति के सामने खड़े होकर जोर से “राम” को पुकार दी और वहीं गिर गया। फिर उठा नहीं।

ऐसा रास्ता है जुआरी का। रामदुवारे जो मरे! वह परम जीवन को उपलब्ध हो जाता है।

ओशो

राम राम जिन्दगी भर कहने से क्या फायदा 

इसी तरह एक सेठ जो अपने मुख से कभी राम नाम नहीं लेता था  लोग हमेशा उसे कहा करते थे।

आखिर तुम राम का नाम क्यों नहीं लेते? राम का नाम भगवान का नाम है, तुम्हीं इसे लेना चाहिए। उसकी पत्नी भी हमेशा कहा करती थी कि राम का नाम लिया करो राम कभी तुम्हारे मुंह से निकलता ही नहीं सिर्फ हंसकर टाल देता था और कभी भी इसका जिक्र किसी से नहीं करता था कि वह क्या चाहता है। आखिर एक दिन सोते-सोते अचानक ही सेठ के मुंह से निकला “राम” यह शब्द उसकी पत्नी ने सुन लिया तो उसे बहुत हैरानी हुई कि यह तो कभी राम का नाम लेता नहीं। आखिर सोते-सोते उसके मुंह से कैसे राम का नाम निकल गया। सुबह हुई सुबह होते ही उस सेठानी ने सेठ से कहा, रात को आपका सोते-सोते मुख से निकला राम आखिर आपने राम का नाम ले ही लिया। इस सेठ के मुंह में से सिर्फ को बहुत हैरानी हुई।  aur achank use heart attack aa gya…क्या राम में निकल गया, इतना बोलते हैं उसी क्षण से अपने प्राण त्याग दिए।

इस कहानी से हमें यह भी समझ में आता है राम राम जिन्दगी भर कहने से क्या फायदा .. कि लोग दिखावे के लिए राम का नाम तो लेते हैं लेकिन असल में जो राम का नाम लिया जाता है, वह अपने अंदर लिया जाता है और इतनी तरीके से लिया जाता है कि बाहर किसी को भनक ना हो। दिखावे की पूजा आज के समय में हर कोई कर लेता है लेकिन जो असल पूजा है वह बहुत छुपा कर और अपने अंदर की जाती है issi liye kaha gya hai osho( राम राम जिन्दगी भर कहने से क्या फायदा |

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