Book Of Osho || jiven ka har pal aanad kaise ho?

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book of osho jiven kahar pal aanad kaise ho

jiven ka har pal aanad kaise ho? ||

 रोम के एक सम्राट ने अपने बड़े वजीर को फांसी की आज्ञा दे दी थी। उस दिन उसका जन्म—दिन था, वजीर का जन्म—दिन था। घर पर मित्र इकट्ठे हुए थे।   संगीतज्ञ आए थे, नर्तक थे, नर्तकियां थीं। भोज का आयोजन था, जन्म—दिन था उसका। कोई ग्यारह बजे दोपहर के बाद सम्राट के आदमी आए। वजीर के महल को नंगी तलवारों ने घेरा डाल दिया।      

भीतर आकर दूत ने खबर दी कि आपको खबर भेजी है सम्राट ने कि आज शाम छह बजे आपको गोली मार दी जाएगी | उदासी छा गई। छाती पीटी जाने लगीं। वह घर जो नाचता हुआ घर था एकदम से मुर्दा हो गया, सन्नाटा छा गया, नृत्य, गीत बंद हो गए, वाद्य शून्य हो गए।        

भोजन का पकना, बनना बंद हो गया। मित्र जो आए थे वे घबड़ा गए। घर में एकदम उदासी छा गई। सांझ छह बजे, बस सांझ छह बजे आज ही मौत! सोचा भी नहीं था कि जन्म—दिन मृत्यु का दिन बन जाएगा।        

लेकिन वह वजीर, वह जिसकी मौत आने को थी, वह अब तक बैठा हुआ नृत्य देखता था। अब वह खुद उठ खड़ा हुआ और उसने कहा कि वाद्य बंद मत करो और अब नृत्य देखने से ही न चलेगा, अब मैं खुद भी नाचूंगा। क्योंकि आखिरी दिन है यह। फिर इसके बाद कोई दिन नहीं है। और सांझ को अभी बहुत देर है। और चूंकि यह आखिरी सांझ है, अब इसे उदासी में नहीं गंवाया जा सकता।        

अगर बहुत दिन हमारे पास होते तो हम उदास भी रह सकते थे। वह लक्जरी भी चल सकती थी। अब अवसर न रहा, अब उदास होने के लिए क्षण भर का अवसर नहीं है। बजने दो वाद्य, हो जाए नृत्य शुरू। आज हम नाच लें, आज हम गीत गा लें, आज हम गले मिल लें, क्योंकि यह दिन आखिरी है।        

लेकिन वह घर तो हो गया था उदास। वे वाद्यकार हाथ उठाते भी तो वीणा न बजती। उनके हाथ तो हो गए थे शिथिल। वे चौंक कर देखने लगे। वह वजीर कहने लगा, बात क्या है? उदास क्यों हो गए हो?        

वे कहने लगे कि कैसे, मौत सामने खड़ी है, हम कैसे खुशी मनाए? तो उस वजीर ने कहा जो मौत को सामने देख कर खुशी नहीं मना सकता वह जिंदगी में कभी खुशी नहीं मना सकता। क्योंकि मौत रोज ही खड़ी  है  तो क्यो न जीवन का हर पल आनन्द हो          

मौत तो रोज ही सामने खड़ी है। कहां था पक्का यह कि मैं सांझ नहीं मर जाऊंगा? हर सांझ मर सकता था। हर सुबह मर सकता था। जिस दिन पैदा हुआ उस दिन से ही किसी भी क्षण मर सकता था। पैदा होने के बाद अब एक ही क्षण था मरने का जो कभी भी आ सकता था। मौत तो हर दिन खड़ी है। मौत तो सामने है। अगर मौत को सामने देख कर कोई खुशी नहीं मना सकता तो वह कभी खुशी नहीं मना सकता।तो क्यो न जीवन का हर पल आनन्द हो      

और वह वजीर कहने लगा, और शायद तुम्हें पता नहीं है, जो मौत के सामने खड़े होकर खुशी मना लेता है उसके लिए मौत समाप्त हो जाती है। उससे मौत हार जाती है,जो मौत के सामने खड़े होकर हंस सकता है।          

मजबूरी थी वह वजीर तो नाचने लगा तो वाद्य—गीत शुरू हुए थके और कमजोर हाथों से। नहीं, सुर— साज नहीं बैठता था। उदास थे वे लोग, लेकिन फिर भी जब वह नाचने लगा था…।        

सम्राट को खबर मिली, वह देखने आया। इसकी तो कल्पना भी न थी। जान कर ही जन्म—दिन के दिन यह खबर भेजी गई थी कि कोई गहरा बदला चुकाने की इच्छा थी कि जब सब खुशी का वक्त होगा  तभी दुख की यह खबर गहरा से गहरा आघात पहुंचा सकेगी। जब सारे मित्र इकट्ठे होंगे तभी यह खबर— यह बदले की इच्छा थी।        

लेकिन जब दूतों ने खबर दी कि वह आदमी नाचता है और उसने कहा है कि चूंकि सांझ मौत आती है इसलिए अब यह दिन गंवाने के लायक न रहा, अब हम नाच लें, अब हम गीत गा लें, अब हम मिल लें। अब जितना प्रेम मैं कर सकता हूं कर लूं और जितना प्रेम तुम दे सकते हो दे लो, क्योंकि अब एक भी क्षण खोने जैसा नहीं है। सम्राट देखने आया। वजीर नाचता था। धीरे— धीरे, धीरे— धीरे उस घर की सोई हुई आत्मा फिर जग गई थी। वाद्य बजने लगे थे, गीत चल रहे थे।

सम्राट देख कर हैरान हो गया! वह उस वजीर से पूछने लगा, तुम्हें पता चल गया है कि सांझ मौत है और तुम हंस रहे हो और गीत गा रहे हो?        तो उस वजीर ने कहा. आपको धन्यवाद! इतने आनंद से मैं कभी भी न भरा था जितना आज भर गया हूं और आपकी बड़ी कृपा कि आपने आज के दिन ही यह खबर भेजी।          

आज सब मित्र मेरे पास थे, आज सब वे मेरे निकट थे जो मुझे प्रेम करते हैं और जिन्हें मैं प्रेम करता हूं। इससे सुंदर अवसर मरने का और कोई नहीं हो सकता था। इतने निकट प्रेमियों के बीच मर जाने से बड़ा सौभाग्य और कोई नहीं हो सकता था। आपकी कृपा, आपका धन्यवाद! आपने बड़ा शुभ दिन चुना है, फिर मेरा यह जन्म—दिन भी है।              

और मुझे पता भी नहीं था—बहुत जन्म—दिन मैंने मनाए हैं, बहुत सी खुशियों से गुजरा हूं लेकिन इतने आनंद से भी मैं भर सकता हूं इसका मुझे पता नहीं था।    यह आनंद की इतनी इंटेंसिटी, तीव्रता हो सकती है मुझे पता नहीं था। आपने सामने मौत खड़ी करके मेरे आनंद को बड़ी गहराई दे दी। चुनौती और आनंद एकदम गहरा हो गया। आज मैं पूरी खुशी से भरा हुआ हूं मैं कैसे धन्यवाद करूं?  

वह सम्राट अवाक खड़ा रह गया। उसने कहा कि ऐसे आदमी को फांसी लगाना व्यर्थ है, क्योंकि मैंने तो सोचा था कि मैं तुम्हें दुखी कर सकूंगा। तुम दुखी नहीं हो सके, तुम्हें मौत दुखी नहीं कर सकती तो तुम्हें मौत पर ले जाना व्यर्थ है। तुम्हें जीने की कला मालूम है, मौत वापस लौट जाती है।   जिसे भी जीने की कला मालूम है वह कभी भी नहीं मरा है और न मरता है, न मर सकता है। और जिसे जीने की कला मालूम नहीं वह केवल भ्रम में होता है कि मैं जी रहा हूं वह कभी नहीं जीता, न कभी जीआ है, न जी सकता है।      

उदास आदमी जी ही नहीं रहा है, न जी सकता है। उसे जीवन की कला का ही पता नहीं। केवल वे जीते हैं जो हंसते हैं, जो खुश हैं, जो प्रफुल्लित हैं,       जो जीवन के छोटे से छोटे कंकड़—पत्थर में भी खुशी के हीरे—मोती खोज लेते हैं, जो जीवन के छोटे—छोटे रस में भी परमात्मा की किरण को खोज लेते हैं, जो जीवन के छोटे—छोटे आशीषों में, जीवन के छोटे—छोटे आशीषों की वर्षा में भी प्रभु की कृपा का आनंद अनुभव कर लेते हैं।      

केवल वे ही जीते हैं। केवल वे ही जीते हैं! केवल वे ही सदा जीए हैं और कोई भी आदमी जिंदा होने का हकदार नहीं है—जिंदा नहीं है।

ओशो, प्रभु की पगडंडिया (प्रवचन-6)

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