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जीते जी मरना

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₩₩ जीते जी मरना ₩₩
**आचार्य रजनीश **

मरना 2 प्रकार का होता है। एक मरना वो है जिसमे आत्मा शरीर को खाली कर देती है, और उसके बाद शरीर को जलाकर राख किया जाता है इसे मौत या मरना कहते हैं,

लेकिन यहां जी ते जी मरने का अर्थ है मृत्यु से पहले मरना या अपनी मर्जी से रोज – रोज मरना क्योंकि इसमे जिन्दा रहते हुए ही शरीर से आत्मा को खाली करना होता है।

जब कोई गुरूमुख आंखो के केन्द्र पर पहुंचता है तो उसकी रूहानी प्रगति शुरू होती है। उसकी आत्मा नौ द्वारा से सिमट कर आंखों के पीछे आजाती है और शरीर शून्य यानी मुर्दे के समान हो जाता है। तब शिष्य की आत्मा अंदर के आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करती है जब शरीर अचेत हो जाता है, परन्तु शिष्य अंतर मे पूरी तरह सजग रहता है वहां उसकी चेतना पूर्ण सक्रिय रहती है।

आत्मा को स्थूल शरीर मे समेट कर आंखों के केंद्र पर लाने की इस क्रिया को ही संतो ने जी ते जी मरना कहा है।

संतो के जी ते जी मरने का कहने का भाव ये है कि संसार के प्रति मृत यानी उदासीन हो जाना है। संसार के आकर्षणो मे से अनासक्त हो जाना है।

आमतौर पर मृत्यु के समय आत्मा शरीर के विभिन्न अंगों – हाथ, पैर, धड आदि से सिमट कर आंखों के पीछे आती है और यही से निकल कर हमेशा के लिए शरीर छोड देती है।

लेकिन संतो द्वारा सिखाये गये अभ्यास मे शिष्य की आत्मा इसी प्रकार इस शरीर को छोड़कर आंखो के केन्द्र में आती है और यहां से रूहानी मंडलो मे प्रवेश करती है। परन्तु इस अवस्था में उसे शरीर से जोडे रखने वाला सुक्ष्म तार नहीं टूटता जो मौत के समय टूट जाता है। और इस अभ्यास के बाद शिष्य की आत्मा वापस शरीर में आजाती है।इसलिए इसे जीते जी मरना कहा गया है।

यह जीते जी मरने की अवस्था प्रभु प्राप्ति और जन्म मरण के बंधनो से छुटने का एक मात्र साधन है कबीर साहिब कहते हैं :- “जीते जी मरो और इस प्रकार मरकर पुन:जी उठो तो फिर से तुम्हारा जन्म नहीं होगा।”

जो इस प्रकार जीवित मरकर नाम में समा जाते हैं उनकी लीव सुन्न अर्थात माया रहित शुध्द आध्यात्मिक मंडलो मे लगी रहती है यह जीते जी मरने की अवस्था गुरू के दिये गये नाम के अभ्यास से ही प्राप्त होती है।
संत नामदेव जी कहते हैं कि :- गुरु द्वारा दिए गए शब्द के अभ्यास से मैने अपने आप को पहचाना जिन्दा रहते हूए मरने की विधि सिखी
जब तक जीते जी शरीर को खाली नही करेगें तब तक रूहानी आनंद की गली में कदम नहीं जा सकते
Osho..

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