ओशो कथाएँ-9

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महावीर कहते हैं, प्रक्रिया उलटी होनी चाहिए। पुण्य को भीतर छिपाकर रख लेना, पाप को बाहर प्रगट कर देना। पाप को तो बता देना, क्योंकि जो बता दो वह खो जाता है। पुण्य बताया, पुण्य खो जाएगा। पाप बताया, पाप खो जाएगा। जो बचाकर भीतर रखते हो, वही बीज बनता है। जो छिपाया, वही बढ़ेगा। पाप छिपाओगे, पाप बढ़ेगा। पुण्य छिपाओगे, पुण्य बढ़ेगा। अब तुम पर निर्भर है। गणित साफ है। अगर तुमने पाप छिपाया, तो पाप बढ़ता जाता है। वह तुम्हारी रंध्र-रंध्र में मवाद की तरह फैल जाता है। उसकी अंतःधारा तुम्हें पूरी तरह ग्रसित कर लेती है। और पुण्य तुम प्रगट करते हो, वह खो जाता है हाथ से। पुण्य प्रगट हुआ, ऐसे जैसे कि सुगंध निकल गयी फूल से। फूल खाली रह गया। गंध गयी।

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