ओशो कथाएँ—–13

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ओशो कथाएँ—13

एक बहुत बड़ा संगीतज्ञ हुआ। उसकी अनोखी शर्त हुआ करती थीं। एक राजमहल में वह अपना संगीत सुनाने को गया। उसने कहा कि मैं एक ही शर्त पर अपनी वीणा बजाऊंगा कि सुननेवालों में से किसी का भी सिर न हिले। और अगर कोई सिर हिला तो मैं वीणा बजाना बंद कर दूंगा। वह राजा भी अपनी ही तरह का था। उसने कहा वीणा रोकने की कोई जरूरत नहीं। हमारे आदमी तैनात रहेंगे और जो सिर हिलेगा वे उस सिर को ही काट कर अलग कर देंगे।

संध्यान सारे नगर में यह सूचना करवा दी गई कि जो लोग सुनने आए थोड़ा समझ कर आए, अगर संगीत सुनते वक्त कोई सिर हिला तो वह अलग करवा दिया जाएगा। लाखों लोग संगीत सुनने को उत्सुक थे। उतना बड़ा संगीतज्ञ गांव में आया था। सबको अपने दुख को भूलने का एक सुअवसर मिला था। कौन उसे चूकना चाहता? लेकिन इतनी दूर तक सुख लेने को कोई भी राजी न था। गर्दन कटवाने के मूल्य पर संगीत सुनने को कौन राजी होता? भूल से गर्दन हिल भी सकती थी। और हो सकता है सिर संगीत के लिए न हिला हो, मक्खी बैठ गई हो और गर्दन हिल गई हो या हो सकता है किसी और कारण से हिल गई हो। लोग जानते थे कि राजा पागल है और फिर बाद में इस बात की कोई सुनवाई न होगी कि गर्दन किसलिए हिली थी। बस गर्दन का हिलना ही काफी हो जाएगा। इसके बावजूद भी उस रात्रि कोई दो तीन सौ लोग संगीत सुनने गए। वे लोग जो जीवन खोने के मूल्य पर भी सूख चाहते थे वहां आए। वीणा बजी। कोई घंटे भर तक लोग ऐसे बैठे रहे जैसे मूर्तियां हों। लोगों ने जैसे डर के कारण सांस भी न ली हो। दरवाजे बंद करवा दिए थे ताकि कोई भाग न जाए। नंगी तलवारें लिए हुए सैनिक खड़े थे किसी की भी गर्दन एक क्षण में अलग की जा सकती थी।

घंटा बीता, दो घंटे बीते, आधी रात होने के करीब आ गई। फिर राजा हैरान हुआ, उसके सिपाही भी हैरान हुए, जो कि नंगी तलवारें लिए हुए खड़े थे। उन्होंने देखा दस-पंद्रह सिर धीरे-धीरे हिलने लगे। संख्या और बढ़ी। रात पूरी होते-होते कोई चालीस-पचास सिर हिलने लगे थे। वे पचास लोग पकड़ लिए गए। राजा ने उस संगीतज्ञ को कहा: इनकी गर्दन अलग करवा दें? उस संगीतज्ञ ने कहा: नहीं। मैंने शर्त बहुत और अर्थों में रखी थी। अब यही वे लोग हैं जो मेरे संगीत को सुनने के सच्चे अधिकारी हैं। कल सिर्फ ये लोग संगीत सुनने आ सकेंगे।

राजा ने उन लोगों से कहा: ठीक है कि संगीतज्ञ की शर्त का यह अर्थ रहा हो, लेकिन तुम्हें तो यह पता था पागलो! तुमने गर्दन क्यों हिलाई? उन आदमियों ने कहा: हमने गर्दन नहीं हिलाई, गर्दन हिल गई होगी। क्योंकि जब तक हम मौजूद थे गर्दन नहीं हिली, लेकिन जब हम गैर-मौजूद हो गए फिर हमें कोई पता नहीं। जब तक हम सजग थे, जब तक हमें होश था, हम गर्दन सम्हाले रहे। फिर एक घड़ी ऐसी आ गई जब हमें कोई होश नहीं रहा। हम संगीत में इतने डूब गए कि लगभग बेहोश ही हो गए। उस बीच फिर गर्दन हिली हो तो हमें कोई पता नहीं है। तो अब भला आप हमारी गर्दन कटवा लें लेकिन कसूरवार हम नहीं है। क्योंकि हम मौजूद ही नहीं थे। हम बेहोश थे। अपने होश में हमने गर्दन नहीं हिलाई।

क्या इतनी बेहोशी संगीत से पैदा हो सकती है?

जरूर हो सकती है, मनुष्य के जीवन में बेहोशी के बहुत रास्ते हैं। जितनी इंद्रियां हैं उतने ही बेहोश होने के रास्ते भी हैं। प्रत्येक इंद्रिय का बेहोश होने का अपना रास्ता है। कान परध्वनियों के द्वारा बेहोशी लाई जा सकती है। अगर इस तरह के स्वर और इस तरह की ध्वनियां कान पर फेंकी जाए कि कान में जो सचेतना है वह सो जाए, शिथिल हो जाए..तो धीरे-धीरे कान तो बेहोश होगा ही उसके साथ ही पूरा चित्त भी सो जाएगा, क्योंकि इस हालत में कान के पास ही सारा मन एकाग्र और इकट्ठा हो जाएगा और जैसे कान में शिथिल आएगी उसके साथ ही पूरा चित्त भी शिथिल होकर बेहोश हो जाएगा। इसी तरह आंखें बेहोश करवा सकती हैं। सौंदर्य को देखकर आंखें हो सकती हैं। और आंखें बेहोश हो जाए तो पीछे से पूरा चित्त बेहोश हो सकता है।

इस भांति अगर हम बेहोश हो जाए तो होश में लौटने पर लगेगा कि कितना अच्छा हुआ। क्योंकि इस बीच किसी भी दुख का कोई पता न था, कोई चिंता न थी, कोई कष्ट न था और कोई समस्या न थी। नहीं थी इसलिए क्योंकि आप ही नहीं थे। आप होते तो ये सारी चीजें होती। आप गैरमौजूद थे इसलिए कोई चिंता न थी, कोई दुख न था, कोई समस्या न थी। दुख तो था लेकिन उसे जानने के लिए जो होश चाहिए वह खो गया था। इसलिए उसका कोई पता नहीं चलता था। इसे, जो लोग आनंद समझ लेते हैं, वे भूल में पड़ जाते हैं। उनका जीवन बिना आनंद को जाने एक बेहोशी में ही बात जाता है और आनंद से वे सदा के लिए अपरिचित ही हर जाते हैं।

इसीलिए मैं कहता हूं कि सत्य की खोज की जरूरत है, क्योंकि उसके बिना आनंद की कोई उपलब्धि न किसी को हुई है और न हो सकती है।

ओशो

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