ओशो कथाएँ-15

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बंगाल में एक बहुत बड़ा वैयाकरण हुआ। कभी मंदिर नहीं गया। उसके पिता बूढ़े होने लगे थे, नब्बे साल की उम्र हो गयी पिता की। बेटा भी अब कोई सत्तर पार कर रहा है। आखिर पिता ने कहा कि तू कब जाएगा मंदिर, कब राम को पुकारेगा? तो बेटे ने कहा : मैं हूं व्याकरण का ज्ञाता। एक वचन में “राम”, “राम” जिंदगी भर कहने से क्या फायदा? बहुवचन में एक ही बार राम को पुकार लेंगे। और एक ही बार पुकारूंगा! और पुकार सच्ची होगी तो एक ही बार में पहुंच जाएगी। और पुकार अगर झूठी है तो करोड़ बार में भी कैसे पहुंच सकती है? नाव अगर कागज की है तो करोड़ बार चलाओ, डूब—डूब जाएगी। नाव सच्ची हो तो बस एक बार छोड़ी कि उस पार पहुंची। ऐसे अंधेरे में तीर चलाने से क्या फायदा है? एक बार समग्र शक्ति लगाकर सारी आंखों को एकजुट करके, एकाग्र करके पुकार लूंगा राम को। पिता ने कहा : मैं बूढ़ा हो गया हूं, तू भी सत्तर साल का हुआ, अब इन व्यर्थ की बातों में मत लगा रह। जब भी तुझसे कहता हूं, तभी तू यह बात कहता है—एक बार पुकार लूंगा! आखिर कब पुकारेगा? तो उसने कहा : आज ही पुकार लेता हूं।

बेटा मंदिर गया। जैसे बाप भी रोज मंदिर जाता था. . .जिंदगीभर का नियम था। बाप राह देखता रहा कि बेटा लौटता होगा, लौटता होगा, लौटता होगा। नहीं लौटा। दोपहर होने लगी, सूरज ढलने लगा, तो बाप भागा मंदिर गया कि बात क्या हुई? तब तक मंदिर से भी लोग आ रहे थे, उन्होंने कहा कि तुम्हारा बेटा तो चल बसा। उसने तो बस एक बार मूर्ति के सामने खड़े होकर जोर से “राम” को पुकार दी और वहीं गिर गया। फिर उठा नहीं।

ऐसा रास्ता है जुआरी का। रामदुवारे जो मरे! वह परम जीवन को उपलब्ध हो जाता है।

ओशो

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