ओशो कथाएँ–17

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❤ अंग्रेजी का बड़ा कवि हुआ। कहते हैं, उसने सैकड़ों स्त्रियों को प्रेम किया। वह जल्दी चुक जाता था, दो—चार दिन में ही एक स्त्री से चुक जाता था। सुंदर था, प्रतिष्ठित था, महाकवि था। व्यक्तित्व में उसके चुंबक था, तो स्त्रियां खिंच जाती थीं—जानते हुए कि दो—चार दिन बाद दूध में से निकाल कर फेंकी गई मक्खियों की हालत हो जाएगी। मगर दो—चार दिन भी बायरन के साथ रहने का सौभाग्य कोई छोड़ना नहीं चाहता था।

कहते हैं: लोग इतने डर गए थे बायरन से कि बायरन जिस रेस्त्रां में जाता, पति अपनी पत्नियों के हाथ पकड़ कर दूसरे दरवाजे से बाहर निकल जाते। सभा—सोसायटियों में बायरन आता तो लोग अपनी पत्नियों को न लाते। थी कुछ बात उस आदमी में। कुछ गुरुत्वाकर्षण था। मगर एक स्त्री उससे झुकी नहीं। जितनी नहीं झुकी, उतना बायरन ने उसे झुकाना चाहा। लेकिन उस स्त्री ने एक शर्त रखी कि जब तक विवाह न हो जाए, तब तक मेरा हाथ भी न छू सकोगे। विवाह पहले, फिर बात।

स्त्री सुंदर थी। और ऐसी चुनौती कभी किसी ने बायरन को दी भी नहीं थी। स्त्रियां पागल थीं उसके लिए। उसका इशारा काफी था। और यह स्त्री जिद पकड़े थी और स्त्री सुंदर थी। सुंदर चाहे बहुत न भी रही हो, लेकिन उसकी चुनौती ने उसे और सुंदर बना दिया। क्योंकि जो हमें पाने में जितना दुर्गम हो, उतना ही आकर्षित हो जाते हैं हम। एवरेस्ट पर चढ़ने का कोई खास मजा नहीं, पूना की पहाड़ी पर भी चढ़ो तो भी चलेगा; मगर एवरेस्ट दुर्गम है, कठिन है। कठिन है, यही चुनौती है।

एडमंड हिलेरी जब पहली दफा एवरेस्ट फर चढ़ा और लौट कर आया तो उससे पूछा गया कि आखिर क्या बात थी, किसलिए तुम एवरेस्ट पर चढ़ना चाहते थे? तो उसने कहा: किसलिए! क्योंकि एवरेस्ट अनचढ़ा था, यह काफी चुनौती थी। यह आदमी के अहंकार को बड़ी चोट थी। एवरेस्ट पर चढ़ना ही था। चढ़ना ही पड़ता। हालांकि वहां पाने को कुछ भी नहीं था ।

वह महिला एवरेस्ट बन गई बायरन के लिए। बायरन दीवाना हो गया। महिलाएं उसके लिए दीवानी थीं, बायरन इस महिला के लिए दीवाना हो गया। और अंततः उसे झुक जाना पड़ा, विवाह के लिए राजी होना पड़ा। जिस दिन चर्च से विवाह करके वे उतरते थे सीढ़ियों पर, अभी उनके सम्मान में, स्वागत में जलाई गई मोमबत्तियां बुझी भी न थीं। अभी मेहमान जा ही रहे थे। अभी चर्च की घंटियां बज रही थीं। वह उस स्त्री का हाथ पकड़ कर सीढ़ियां उतर रहा है और तभी एक क्षण ठिठक कर खड़ा हो गया। एक स्त्री को उसने सामने से रास्ते पर गुजरते देखा।

बायरन, ऐसे आदमी ईमानदार था। उसने अपनी पत्नी को कहा: सुनो! तुम्हें दुख तो होगा, लेकिन सच बात मुझे कहनी चाहिए। कल तक मैं दीवाना था, लेकिन जैसे ही तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में आ गया और हम विवाहित हो गए हैं, मेरा सारा रस चला गया। तुम पुरानी पड़ गईं। अभी कोई संबंध भी नहीं बना है, लेकिन तुम पुरानी पड़ गईं। और वह जो स्त्री सामने से गई है गुजरती हुई, एक क्षण को मैं उसके प्रति मंत्रमुग्ध हो गया। मैं तुम्हें भूल ही गया कि तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में है। मुझे तुम्हारी याद भी नहीं रही। यह मैं तुमसे कह देना चाहता हूं। मेरा रस खत्म हो गया, चूंकि तुम मेरे हाथ में हो। मेरा रस समाप्त हो गया।

तुम शायद इतने ईमानदार न भी होओ, लेकिन तुमने खयाल किया है: जिस चीज को पाने के लिए तुम परेशान थे…। एक सुंदर कार खरीदना चाहते थे, वर्षों धन कमाया, मेहनत की, फिर जिस दिन आकर पोर्च में गाड़ी खड़ी हो गई, तुमने उसको चारों तरफ चक्कर लगा कर देखा और छाती बैठ गई, कि बस हो गया। अब? अब क्या करने को है? शायद एकाध दिन उमंग रही, राह पर निकले कार लेकर। लेकिन कार उसी दिन से पुरानी पड़नी शुरू हो गई, जिस दिन से तुम पोर्च में ले आए। अब रोज पुरानी ही होगी। और रोज—रोज तुम्हारे और उसके बीच का जो रस था वह कम होता चला जाएगा। इसी कार के लिए तुम कई दिन सोए नहीं, रात सपने देखे, दिन सोचा—विचारा—और यही अब तुम्हारे पोर्च में आकर खड़ी है और इसकी याद भी नहीं आती। यही तुम्हारे पूरे जीवन की कथा है।

मन नये की मांग करता है, लेकिन नया तो मिलते ही पुराना हो जाता है और फिर मन विषाद से भरता है।
जो नये को मांगेगा, वह बार—बार दुख में पड़ेगा, क्योंकि नया पुराना होता है।
शाश्वत को खोजो, जो नया भी नहीं है, पुराना कभी होता नहीं। जो सदा एक सा है, एकरस है। उस एकरसता का नाम ही परमात्मा है।

ओशो
🙏

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