ओशो कथाएँ–18

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एक सम्राट के बडे वजीर की मृत्यु हो गई थी। उसके समक्ष राज्य के सर्वाधिक बुद्धिमान व्यक्ति को चुन कर वजीर बनाने का जटिल सवाल था। फिर अनेक प्रकार की परीक्षाओं के द्वारा अंततः तीन व्यक्ति चुने गए। अब उन तीन में से भी एक को चुना जाना था। उसकी निर्णयात्मक-परीक्षा के एक दिन पूर्व ही यह अफवाह उडा दी गई थी कि सम्राट उन्हें एक ऐसे कक्ष में बंद करने को है, जिसके द्वार पर राज्य के कुशलतम यांत्रिकों द्वारा निर्मित एक ऐसा अदभुत ताला लगा हुआ है, जिसे जो गणित में सर्वाधिक प्रतिभाशाली होगा, केवल वही खोलने में समर्थ हो सकता है। उस रात्रि उन तीन व्यक्तियों में से दो तो चिंता और उत्तेजना के कारण सो ही नहीं सके। वे रात्रिभर तालों के संबंध में लिखे गए शास्त्रों को प.ढते रहे और गणित के नियमों और सूत्रों को समझते रहे। सुबह तक तो वे गणित से इतने ज्यादा भर गए थे कि दो-दो जोडना भी शायद उनसे संभव नहीं होता!

राजमहल जाते समय उन्होंने गणित की कुछ पुस्तकें भी अपने वस्त्रों में छिपा ली थीं, जिनकी किसी भी समय आवश्यकता पड सकती थी।

अपनी दृष्टि में वे सब भांति तैयार थे, यद्यपि शास्त्रों के साथ रात्रि-जागरण करने के कारण उनके मन ठिकाने नहीं थे और उनके पैर ऐसे पड रहे थे जैसे वे नशे में हों। शास्त्रों और ज्ञान का भी नशा तो होता ही है। लेकिन उन दो को वह तीसरा व्यक्ति निश्चय ही पागल मालूम हो रहा था, जो रात्रि भर शांति से सोया रहा था। उसकी निशिंचतता सिवाय पागलपन के और किस बात की द्योतक हो सकती थी? वे दोनों रात्रि में भी उसके ऊपर हंसते रहे थे और अब भी उसकी नासमझी पर हंस रहे थे। राजमहल पहुंच कर उन्हें ज्ञात हुआ कि निश्चय ही वह अफवाह सच थी। वहां पहुंचते ही उन्हें एक विशाल कक्ष में बंद कर दिया गया, जिसके द्वार पर वह बहुचर्चित ताला लगा हुआ था, जो उस समय की यांत्रिक प्रतिभा का अन्यतम आविष्कार था। उस ताले को गणित के आधार पर निर्मित किया गया था और वह एक अत्यंत कठिन पहेली की भांति था, जिसे गणित के द्वारा ही हल भी किया जा सकता था। ये सब बातें अफवाहों से भी ज्ञात थीं और उस ताले पर बने गणित-अंक और चिह्न भी इन्हीं की घोषणा कर रहे थे। उन तीनों व्यक्तियों को कक्ष में बंद कर सम्राट के निर्णय से अवगत करा दिया गया कि जो भी व्यक्ति उस कक्ष के ताले को खोल कर सबसे पहले बाहर निकलने में समर्थ होगा, उसे ही महामंत्री के पद पर नियु

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