ओशो कथाएँ–19

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ओशो कथाएँ -18

मैंने सुना है, ईजिप्त में एक बहुत पुराना मंदिर था। हजारों वर्ष पुराना मंदिर था। लेकिन उस मंदिर के देवता का कभी किसी ने कोई दर्शन नहीं किया था। उस देवता के ऊपर पर्दा पड़ा हुआ था। और पुजारी भी उसे नहीं छू सकते थे। सौ पुजारी थे उस मंदिर के। और सौ पुजारी इकट्ठे ही उस मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते थे, ताकि कोई एक पुजारी उसका पर्दा उठा कर अंदर की मूर्ति को न देख ले। हजारों वर्ष की परंपरा यही थी कि मूर्ति को देखना अनुचित है, अधार्मिक है, पाप है। कभी किसी ने उस मंदिर की मूर्ति नहीं देखी थी। जिन्होंने देखी होगी, वे कई जमाने पहले खो गए। हजारों लोग उस मंदिर के दर्शन करने आए, लेकिन वे पर्दे के सामने ही दर्शन करके चले जाते। कौन पाप करता?

लेकिन एक दिन एक पागल युवक आया उस मंदिर में, और हाथ–झुक कर जब वह पूजा कर रहा था, अचानक दौड़ा और उसने पर्दा उठा लिया। एक क्षण में यह हो गया। पर्दा उठा कर उसे क्या दिखाई पड़ा? बहुत आश्र्चर्य की बात हुई। वहां कोई मूर्ति न थी। वहां सिर्फ एक दर्पण था, जिसमें उसे अपना ही चेहरा दिखाई पड़ा। वहां कोई मूर्ति थी ही नहीं। वहां सिर्फ एक दर्पण था, जिसमें उसने अपने को ही देखा।

लेकिन उस मंदिर का राज सारे लोगों में फैल गया। लोगों ने आना उस मंदिर में बंद कर दिया। क्योंकि जिस मंदिर में मूर्ति न हो भगवान की, और धोखा दिया गया हो और सिर्फ दर्पण रखा हो, तो उस मंदिर में कौन जाएगा? उस मंदिर में कोई भी नहीं गया। धीरे-धीरे वह मंदिर गिर गया। उसके पुजारी उजड़ गए। क्योंकि जिस मंदिर में सिर्फ दर्पण हो, वहां कौन जाएगा? और मैं आपसे कहता हूं: कि अगर लोग जानते होते, तो और सब मंदिरों को छोड़ देते और उसी मंदिर में जाते। क्योंकि जहां, जो हम हैं, वही दिखाई पड़ जाए, वही मंदिर है। धर्म का एक ही राज है कि हमें दिखाई पड़ जाए कि हम कौन हैं। धर्म एक दर्पण बन जाए और हमें पता चल जाए कि हम कौन हैं।

मन का दर्पण प्रवचन न. १

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