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साक्षी का मतलब क्या है?

🌹साक्षी का मतलब क्या है?
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साक्षी का मतलब है: देखने वाला, गवाह। मैं शरीर नहीं हूं, ऐसा किसका अनुभव होता है? मैं मन नहीं हूं, ऐसा किसका अनुभव होता है? ऐसा कौन इनकार करता चला गया है कि मैं यह नहीं हूं, मैं यह नहीं हूं, मैं यह नहीं हूं।

एक तत्व हमारे भीतर दर्शन का, दृष्टि का, द्रष्टा का, देखने का है। हम देख रहे हैं; हम जाँच कर रहे हैं। वह जो देख रहा है, वही साक्षी है; जो दिखाई पड़ रहा है, वही है। जो देख रहा है, वही मैं हूं; और जो दिखाई पड़ रहा है, वही है। अध्यास का अर्थ है कि जो देख रहा है, वह भूल से यह समझ लेता है कि जो दिखाई पड़ रहा है वह मैं हूं। यह अधीरता है। एक हीरा मेरा हाथ में रखा है। मैं उसे देख रहा हूँ। अगर मैं यह कहने लगूं कि मैं हीरा हूं तो अभ्यास होगा। क्योंकि हीरा मेरे हाथ पर रखा है, दिखाई पड़ रहा है, आब्जेक्ट है, एक विषय है, और मैं देख रहा हूं, अलग हूं। देखने वाला सदा ही अलग है उसे जो दिखाई पड़ता है। देखने वाला कभी भी दृश्य के साथ एक नहीं है। देखने वाला सदा ही दिखाई पड़ने वाले से भिन्न है। मैं तुम्हें देख रहा हूँ क्योंकि तुम भिन्न हो, तुम मुझे देख रहे हो क्योंकि मैं तुमसे भिन्न हूँ। जो भी दिखाई पड़ता है वह अलग है। उसको ही अपने से अभिन्न समझ लेना अधेस है। जिसको आप देख रहे हैं उसके साथ इतने मोहित हो जाएं कि लगने लगे यह मैं ही हूं, वही दिलन्टी है। इस भ्रांति को तोड़ना है और अंतिम उस शुद्ध तत्व को खोज लेना है जो सदा ही देखने वाला है और कभी दिखाई नहीं पड़ता।

यह थोड़ा कठिन है। जो देखने वाला है वह कभी दिखाई नहीं पड़ सकता है। क्योंकि वह किसको दिखाई देगा? आप सब चीजों को देख सकते हैं, की सिर्फ अपनी छोड़ कर कर सकते हैं। आप खुद को कैसे देख रहे हैं? क्योंकि देखने में दो की तो जरूरत पड़गी ही – जो देखे और जो दिखाई पड़े। आप सब कुछ देख सकते हैं, अपने भर को आप नहीं देख सकते हैं। मैं कैसी दिख रही हूँ? किसी हंटरटे से हम उसी हंटरटे को पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं! सब पकड़ सकते हैं कि लाशटे से, सिर्फ उसी लाशटे को पकड़ने की कोशिश नाकाम होगी। और तब बड़ी मुश्किल यह होगी कि यह हंटरटा भी कितना पागल है! सब कुछ पकड़ लेता है तो अपने को क्यों नहीं पकड़ पाता है?

हम सब कुछ देख लेते हैं, अपने को नहीं देख पाते हैं। नहीं भी देखेंगे। और जोको भी हम देख लेंगे, जान लेना कि वह हम नहीं हैं। तो जिस चीज को भी आप देखने में समर्थ हो जाएं, आप समझ लेना कि इतनी बात तय हो गई कि यह मैं नहीं हूं। कोई भी आदमी अगर ईश्वर का दर्शन कर ले, तो समझ लेना एक बात पक्की हो गई कि तुम ईश्वर नहीं हो। आपको भीतर प्रकाश का दर्शन हो जाए, तो समझ लेना एक बात पक्की हो गई है कि आप प्रकाश नहीं हैं। आपको आनंद का अनुभव हो जाए, तो आप एक बात पक्की समझ लेना कि आप आनंद नहीं हैं। जो बात का भी अनुभव हो जाए वह आप नहीं हैं। आप तो वह हैं जो व्हो अनुभव होता है। तो जो भी चीज अनुभव बन जाती है, उसके आप पार हो जाते हैं। इसलिए एक कठिन बात समझने वाला उपयोगी होगा, कि आध्यात्मिक आत्मा कोई अनुभव नहीं है। दुनिया में सब चीजें अनुभव हैं, अध्यात्म कोई अनुभव नहीं है। अध्यात्म तो उसकी तरफ पहुंच जाना है जिसको सब अनुभव होता है और जो स्वयं कभी अनुभव नहीं बनता – धारणाओक्ता, साक्षी, द्रष्टा।

🌿ओशो🌿
अध्यात्म उपनिषद

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