Osho मनुष्य भी विराट रहस्य का हिस्सा है

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Osho मनुष्य भी विराट रहस्य का हिस्सा है
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Osho मनुष्य भी विराट रहस्य का हिस्सा है

हममें से कई लोग इस बात को समझना चाहते हैं कि ये विराट ब्रहमांड क्या है (osho मनुष्य भी विराट रहस्य का हिस्सा है)  me ye btate hai के एक बड़े नास्तिक दिदरो ने लिखा है कि जगत का न तो कोई बनाने वाला है , न जगत के भीतर कोई रचना की प्रक्रिया है , न इस जगत का कोई सृजनक्रम है . जगत एक संयोग , एक एक्सिडेंट है . घटते – घटते , अनंत घटनाएं घटते – घटते यह सब हो गया है . लेकिन इसके होने के पीछे कोई राज नहीं है . अगर दिदरो की बात सच है , उसका तो अर्थ यह हुआ कि अगर हम कुछ ईंटों को फेंकते जाएं , तो कभी रहने योग्य मकान दुर्घटना हम कुछ ईंटों को फेंकते जाएं , तो कभी रहने योग्य मकान दुर्घटना से बन सकता है . सिर्फ फेंकते जाएं ! या प्रेम को हम बिजली से चला दें और उसके सारे यंत्र चलने लगें , तो केवल संयोग से गीता जैसी किताब छप सकती है . दैवी संपदा वाला व्यक्ति देखता है कि जगत में एक रचना – प्रकिया है . जगत के पीछे चेतना छिपी है . और जगत के प्रत्येक कृत्य के पीछे कुछ राज है . और राज कुछ ऐसा है कि हम उसकी तलहटी तक कभी न पहुंच पाएंगे , क्योंकि हम भी उस राज के हिस्से हैं ; हम उसके स्त्रोत तक कभी न पहुंच पाएंगे , क्योंकि हम उसकी एक लहर हैं . मनुष्य कुछ अलग नहीं है इस रहस्य से . वह इस विराट चेतना में जो लहरें उठ रही हैं , उसका ही एक हिस्सा है . इसलिए न तो वह इसके प्रथम को देख पाएगा , न इसके अंतिम को देख पाएगा . दूर खड़े होकर देखने की कोई सुविधा नहीं है . हम इसमें डूबे हुए हैं . जैसे मछली को कोई पता नहीं चलता कि सागर है . और मछली सागर में रहती है , फिर भी सागर का क्या रहस्य जानती है ! वैसी ही अवस्था मनुष्य की है .
ओशो♣️

Osho मनुष्य भी विराट रहस्य का हिस्सा है मे एक और  osho ka updesh hai… 

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जीवन मंच 

यदि आप जीवन के इस चरण से आते हैं और एक अभिनेता के रूप में आते हैं; जब तुम मरोगे, तुम्हारी मौत वैसी होगी, जब पर्दा गिरता है। इसमें दर्द नहीं होगा। यह एक अधिनियम को ठीक से पूरा करने के लिए अनुपस्थिति होगी। विश्राम की ओर जाने की भावना रहेगी। और काम पूरा हो गया, परमात्मा का आह्वान हो गया, चलो वापस चलते हैं। पर्दा गिर गया।

जर्मनी के एक महान नाटककार गोएथे कवि बन गए। यह नाटकों का जीवन भर का अनुभव था। और गट्टे ने धीरे-धीरे गहराई का अनुभव करना शुरू कर दिया जिसे हम साक्षी कहते हैं, केवल नाटक के अनुभव से। नाटक, और नाटक, और नाटक। धीरे-धीरे पूरा जीवन उन्हें नाटक की तरह लगने लगा। जब गोएथे की मृत्यु हुई, ये उनके अंतिम शब्द थे। उसने आँखें खोली और उसने कहा देखो, अब पर्दा गिरता है!

यह नाटककार की भाषा थी, लेकिन चेहरे पर बड़ी खुशी थी, बहुत आनंद की अनुभूति थी। एक काम कुशलता से पूरा हुआ; पर्दा गिरता है। मृत्यु तो स्क्रीन का पतन है और जीवन फिर एक खेल है, लीला।

ओशो

 

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