Osho Ahankar aur Niahankar

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Osho Ahankar aur niahankar osho ahankar aur niahankar ki ek ktha kehte hai ………… ,

एक सम्राट प्रार्थना कर रहा था एक मंदिर में। वर्ष का पहला दिन था और सम्राट वर्ष के पहले दिन मंदिर में प्रार्थना करने आता था। वह प्रार्थना कर रहा था और परमात्मा से कह रहा था कि मैं क्या हूं! धूल हूं तेरे चरणों की। धूल से भी गया बीता हूं। पापी हूं। मेरे पापों का कोई अंत नहीं है। दुष्ट हूं क्रूर हूं कठोर हूं। मैं कुछ भी नहीं हूं। आई एम जस्ट ए नोबडी, ए नथिंग। बड़े भाव से कह रहा था।

और तभी पास में बैठा एक फकीर भी परमात्मा से प्रार्थना कर रहा था और वह भी कह रहा था कि मैं भी कुछ नहीं हूं। आई एम नोबडी, नथिंग। सम्राट को क्रोध आ गया। उसने कहा, लिसेन, हू इज क्लेमिंग दैट ही इज नथिंग? एंड बिफोर मी! सुन, कौन कह रहा है कि मैं कुछ भी नहीं हूं? और मेरे सामने! जब कि मैं कह रहा हूं कि मैं कुछ भी नहीं हूं तो कौन प्रतियोगिता कर रहा है?

जो आदमी कह रहा है, मैं कुछ भी नहीं हूं, वह भी इसकी फिक्र में लगा हुआ है कि कोई दूसरा न कह दे कि मैं कुछ भी नहीं हूं। कोई प्रतियोगिता न कर दे। अब जब तुम कुछ भी नहीं हो, तो अब क्या दिक्कत है! अब क्या डर है! लेकिन कहीं दूसरा इसमें भी आगे न निकल जाए!

Ahankar के खेल बहुत सूक्ष्म हैं। तो अगर आप किसी niahankari से कहें कि तुमसे भी बड़े niahankari को मैंने खोज लिया है, तो उसको भी दुख होता है, कि अच्छा, मुझसे बड़ा? मुझसे बड़ा भी कोई विनम्र है? तुम गलती में हो। मैं आखिरी हूं। उसके आगे, मुझसे बड़ा विनम्र कोई भी नहीं है। उसको भी पीड़ा होती है। niahankari को भी लगता है कि मुझसे आगे कोई न निकल जाए! तो फिर यह अहंकार की ही यात्रा रही। फिर यह niahankar झूठा है, थोथा है।

Niahankar का मतलब है, हम प्रतियोगिता के बाहर हट गए। अब हमसे कोई आगे—पीछे कहीं भी हो, इससे कोई प्रयोजन नहीं है। हम अपने होने से राजी हो गए। अब हमारी दूसरे से कोई स्पर्धा नहीं है।

Niahankar का मतलब है, मैं जैसा हूं हूं। अब मैं किसी के आगे और पीछे अपने को रखकर नहीं सोचता। अब मैं अपनी तुलना नहीं करता हूं। और मेरा मूल्य मैं तुलना से नहीं आंकता हूं।

जिस दिन कोई व्यक्ति अपना मूल्य तुलना से नहीं आंकता, उसने संसार के तराजू से अपने को हटा लिया। लेकिन ऐसा व्यक्ति परमात्मा की आंखों में मूल्यवान हो जाता है। जो व्यक्ति पड़ोसियों की आंखों का मूल्य खोने को राजी है, वह परमात्मा की आंखों में मूल्यवान हो जाता है। और जो व्यक्ति पडोसियों की आंखों में ही अपने मूल्य को थिर करने में लगा है, उसका कोई मूल्य परमात्मा की आंखों में नहीं हो सकता है।

यहां से जो हटता है प्रतियोगिता से, तत्‍क्षण परमात्मा के हाथों में उसका गौरव है। इसलिए जीसस ने कहा कि जो यहां अंतिम हैं, वे मेरे प्रभु के राज्य में प्रथम हो जाएंगे।

लेकिन आप अंतिम होने की कोशिश इसलिए मत करना कि प्रभु के राज्य में प्रथम होना है! नहीं तो आप अंतिम हो ही नहीं रहे हैं। जीसस जिस दिन पकड़े गए और जिस दिन, दूसरे दिन उनकी मौत हुई, रात जब उनके शिष्य उन्हें छोड़ने लगे, तो एक शिष्य ने उनसे पूछा कि जाते—जाते यह तो बता दो! माना कि तुम्हारे प्रभु के राज्य में हम प्रथम होंगे, लेकिन हम भी बारह हैं। तो सबसे प्रथम कौन होगा? माना कि तुम तो प्रभु के पुत्र हो, तो बिलकुल सिंहासन के बगल में बैठोगे। लेकिन तुम्हारे बगल में कौन बैठेगा?

वे बारह जो शिष्य हैं, उनको भी चिंता है कि वहां बारह की पोजीशन! कौन कहां बैठेगा? तो बात ही चूक गई। जीसस को खो गए। फिर जीसस को समझे ही नहीं।

ओशो
गीता दर्शन

https://youtu.be/kVJsMJLj_b4

Kyu kuch hi lof saflta ko chhu pate hai just watch

https://wealthhiwealth.com/2019/03/02/659/

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