Osho swal jvab kya budhatv ko uplbdh hona bhi niyati hai ||.क्या बुद्धत्व को उपलब्ध होना भी नियत है? अगर ऐसा है, तो फिर कुछ करने या न करने से क्या फर्क पड़ता है?*

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Osho swal jwab kya budhatv ko uplbdh hona bhi niyati hai .क्या बुद्धत्व को उपलब्ध होना भी नियत है? अगर ऐसा है, तो फिर कुछ करने या न करने से क्या फर्क पड़ता है?

Osho swal jvab || kya budhatv

Osho Swal jvab  kya budhatv ko

 

*क्या बुद्धत्व को उपलब्ध होना भी नियत है? अगर ऐसा है, तो फिर कुछ करने या न करने से क्या फर्क पड़ता है?*

*ओशो…*🎤💖🔔

  कोई भी फर्क नहीं पड़ता; लेकिन करना जारी रखना। करना अभिनय की तरह। बुद्धत्व तुम्हारे द्वार अपने आप आ जाएगा। बुद्धत्व का किसी करने, न करने से कोई संबंध भी नहीं है। बुद्धत्व का संबंध साक्षी-भाव से है। जाग गया जो, उसे हम बुद्ध कहते हैं

Ji osho swal jvab  kya budhatv 

अहंकार सुलाए हुए है। वह तुम्हारी नींद है। बस, अहंकार टूट जाए, करने का भाव गिर जाए। करना जारी रखना। क्योंकि तुम्हारी जल्दी है करना ही छोड़ने की, करने का भाव गिराने की जल्दी नहीं है।
तुम चाहते हो, जब कुछ फर्क ही नहीं पड़ता; बुद्धत्व नियत ही है; तो बस आंख बंद करो, चादर ओढो, सो जाओ। तो बुद्ध कोई पागल नहीं थे, नहीं तो वे भी चादर ओढ़कर सो गए होते!
बुद्धत्व नियत है, वह होगा ही, वह घटेगा ही। देर कितनी ही कर सकते हो। कितने ही भटको, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि बुद्धत्व तुम्हारा स्वभाव है। लेकिन अगर चादर ओढ़कर सोए रहे, तो बहुत लंबा हो जाएगा भटकाव। बुद्धत्व तो मिलेगा आखिर में। जब भी चादर से उठोगे, आंख खोलोगे; पाओगे, तुम बुद्धत्व को उपलब्ध हो।
आंख खोलने की कला है, साक्षी हो जाना, कर्ता न होना। इसलिए कर्म छोड़ने की जल्दी मत करना, कर्ता-भाव को गिराने की फिक्र करो।

Osho swal jvab kya budhatv iss question ka answer  bohot sehi trke sediya gya hai …

Osho swal jwab kya budhatv ko uplbdh hona bhi niyati hai .क्या बुद्धत्व को उपलब्ध होना भी नियत है? अगर ऐसा है, तो फिर कुछ करने या न करने से क्या फर्क पड़ता है?*

    Osho swal jvab  me dusra प्रश्न है, साक्षी-भाव से अभिनय की कला तो आती दिखती है, पर आनंद-भाव क्यों कर नहीं जुड़ पाता?*

 तब तुम अभिनय का भी अभिनय ही कर रहे हो। वह असली नहीं है। अभिनय असली होना चाहिए। अगर तुमने अभिनय का भी अभिनय किया, कि भीतर तो तुम जानते हो कि कर्ता हो, मगर अब क्या करें, यह कृष्ण पीछे पड़े हैं; चलो, अभिनय करो! तो आनंद का भाव उदय नहीं होगा। आनंद का भाव तो कसौटी है कि तुमने अगर अभिनय अभिनय की तरह किया, तो आनंद भाव घटता ही है, उसमें कभी कोई अंतर नहीं पड़ता। वह होता ही नहीं उससे विपरीत।…क्रमशः

*गीता दर्शन-(भाग–8) प्रवचन-212*
🌞🌞🙏🙏🌞🌞

Osho swal jvab  …

Osho Sambhog se smadhi tak ….. || युवक और सेक्स || 22 https://wealthhiwealth.com/2019/04/04/osho-sambhog-se-smadhi-tak/

https://wealthhiwealth.com/2021/01/14/osho-kya-dukh-roke-ja-sakte-hai/

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Osho.Swaal jvab kya budhatv

Osho Swal jvab me aaj ka question

  • Is intelligence also destined to be available? If so, then what is the difference with doing or not doing anything? *
  • Osho … * 🎤💖🔔
    No matter what; But continue to do. Like acting. Intelligence will come to your door automatically. Buddhism has nothing to do with any doing or not doing. Wisdom is related to witnessing. He woke up, we call him Buddha.
    The ego is put to sleep. She is your sleep. Simply, the ego breaks down, the sense of doing it drops. Continue to do. Because you have to hurry to quit, there is no hurry to drop the feeling of doing.
    You want when there is no difference; Buddhahood is fixed; So just close your eyes, cover the bed, go to sleep. So Buddha was not mad, otherwise he would have slept with a sheet covered!
    Intelligence is fixed, it will happen, it will happen. How long can you do it? No matter how many things go around, it does not matter. Because intelligence is your nature. But if the bed is covered and asleep, then it will become very long deviation. At last you will get enlightenment. Whenever you get up from the sheet, you will open your eyes; You will find, you are available to enlightenment.
    It is an eye-opening art, to be a witness, not a doer. So do not hurry to give up karma, worry about dropping the subject.
  • And the second question is, the art of acting seems to come from the witnessing house, but why is it not able to connect with pleasure? *
    Then you are also acting for acting. He is not real. The acting must be real. If you also acted, that within you know that you are the doer, but what to do now, this Krishna is behind; Come on, act! So the feeling of bliss will not rise. The sense of enjoyment is the test that if you do acting like acting, then the joy of feeling decreases, there is no difference in it. It does not seem to be the opposite…. Respectively.
  • Gita Darshan – (Part-8) Sermon-212 *

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